*नीचा नगर*
उत्तुंग शिखरों पर नाचते नगर ठगे से खड़े रह गए
पहले क़दमों तले से हिमनद खिसके
और फिर महाकाय पर्वत पिघल कर चौरस हो गए
और वो महान सभ्यताएं भी वहीं आ गयीं जहाँ वो नीचा नगर था
अब काले और सफ़ेद सब चेहरे गलते हुए
एक- दूसरे में मिलने लगे
पानी जैसे होकर, जिसका कोई रंग न था
अब कोई भी चरित्र निश्चित नहीं बचा
न किसी चेहरे का और न उस वक्त का
पर बहुत सारी ऑंखें अब भी उस पानी के ऊपर ही तैर रहीं थीं
वैसी हीं जैसी पहले थीं
हर एक काली भी
और सफ़ेद भी !
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