Saturday, 17 September 2011

नीचा नगर


*नीचा नगर*

उत्तुंग शिखरों पर नाचते नगर ठगे से खड़े रह गए
पहले क़दमों तले से हिमनद खिसके
और फिर महाकाय पर्वत पिघल कर चौरस हो गए
और वो महान सभ्यताएं भी वहीं आ गयीं जहाँ वो नीचा नगर था
अब काले और सफ़ेद सब चेहरे गलते हुए   
एक- दूसरे में मिलने लगे
पानी जैसे होकर, जिसका कोई रंग न था
अब कोई भी चरित्र निश्चित नहीं बचा
न किसी चेहरे का और न उस वक्त का
पर बहुत सारी ऑंखें अब भी उस पानी के ऊपर ही तैर रहीं थीं
वैसी हीं जैसी पहले थीं
हर एक काली भी
और सफ़ेद भी !

Thursday, 15 September 2011

निरुत्तर


तुम अपना अर्थ बूँद-बूँद गिराना / धरती पर
धारा तो खाली कर देती / क्षण भर
मेरा अर्थ न खोजो / मिटटी में
वो किसी बादल में है / अंदर
वो बरसेगा / सावन-भादों / इक झर
और फूटेगा
फूल, पत्ती, अंगूर, सेव, अनार में
रंग, महक, रस, शिल्प में
और लेगा नया अर्थ / रक्त बन कहीं
कहीं तय करेगा सागर की दूरी
जहाँ और भी अर्थ आते होंगे / और फिर
वे सब मिल रचेंगे एक नया अर्थ
पर प्रश्न रहेगा फिर भी / और मैं भी
        निरुत्तर......