तुम अपना अर्थ बूँद-बूँद गिराना / धरती पर
धारा तो खाली कर देती / क्षण भर
मेरा अर्थ न खोजो / मिटटी में
वो किसी बादल में है / अंदर
वो बरसेगा / सावन-भादों / इक झर
और फूटेगा
फूल, पत्ती, अंगूर, सेव, अनार में
रंग, महक, रस, शिल्प में
और लेगा नया अर्थ / रक्त बन कहीं
कहीं तय करेगा सागर की दूरी
जहाँ और भी अर्थ आते होंगे / और फिर
वे सब मिल रचेंगे एक नया अर्थ
पर प्रश्न रहेगा फिर भी / और मैं भी
निरुत्तर......
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